मनोज महतो
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से सामने आई हालिया घटना ने न केवल सामाजिक मर्यादाओं को तार-तार किया है, बल्कि प्रशासन और पुलिस की कार्यसंस्कृति पर भी गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ‘अश्लील नृत्य’ का आयोजन और उसमें जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों की मौजूदगी यह दर्शाती है कि रक्षक ही जब भक्षक बन जाएं, तो समाज में अराजकता का बीज अंकुरित होने लगता है।
जवाबदेही का अभाव
एक अनुविभागीय अधिकारी (SDO) और पुलिसकर्मियों का ऐसे आयोजनों में शरीक होना महज एक ‘व्यक्तिगत चूक’ नहीं है। यह उस व्यवस्था की विफलता है जिसे नियम-कानून लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जब वर्दी और पद की गरिमा अश्लीलता के शोर में खो जाती है, तो आम नागरिक का तंत्र से भरोसा उठने लगता है। वायरल वीडियो ने प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर तो कर दिया, लेकिन सवाल यह है कि क्या बिना वीडियो वायरल हुए प्रशासन की अंतरात्मा नहीं जागती?
कार्रवाई: समाधान या केवल प्रतिक्रिया?
प्रशासन ने आनन-फानन में एसडीओ को पद से हटाया, तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित किया और 14 आयोजकों को जेल भेजा। यह कदम स्वागत योग्य है और एक कड़ा संदेश देने की कोशिश करता है। परंतु, निलंबन और तबादले क्या स्थायी समाधान हैं? ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सेवा नियमावली और नैतिक प्रशिक्षण पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।
सामाजिक सरोकार और मीडिया की भूमिका
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने एक सजग प्रहरी की भूमिका निभाई है। अगर वह वीडियो वायरल न होता, तो शायद यह मामला रफा-दफा कर दिया जाता। एक पत्रकार के तौर पर हमारा यह दायित्व है कि हम केवल घटना की रिपोर्टिंग न करें, बल्कि उन परिस्थितियों पर भी प्रहार करें जो सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को इतना बेखौफ बना देती हैं कि वे खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाने लगते हैं।
निष्कर्ष
गरियाबंद की यह घटना छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत पर भी एक दाग है। ‘नवा छत्तीसगढ़’ के संकल्प में ऐसी अश्लीलता और प्रशासनिक लापरवाही के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि दोषियों को ऐसी सजा मिले जो भविष्य के लिए नजीर बन सके।




