दीपका/गेवरा (काला हीरा विशेष): एशिया की सबसे बड़ी खदानों में शुमार SECL गेवरा परियोजना जहाँ एक ओर मुनाफे के नए कीर्तिमान रच रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय जनसुविधाओं और पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रबंधन की ‘इच्छाशक्ति’ दम तोड़ती नजर आ रही है। नगर के हृदय स्थल और मुख्य बुधवारी बाजार (प्रियदर्शनी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स) के समीप स्थित महात्मा गांधी उद्यान आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
श्रद्धांजलि तक सीमित रह गया है सम्मान
विडंबना देखिए कि जिस उद्यान का नाम राष्ट्रपिता के नाम पर है, वहां प्रबंधन की नजर सिर्फ साल में तीन दिन (26 जनवरी, 15 अगस्त और गांधी जयंती) ही पड़ती है। बाकी दिन यह ऐतिहासिक उद्यान आवारा मवेशियों, कुत्तों और असामाजिक तत्वों का अड्डा बना रहता है।
उद्यान की प्रमुख समस्याएं: एक नजर में
झूले और इंफ्रास्ट्रक्चर: बच्चों के लिए लगाए गए झूले अब सिर्फ लोहे के ढांचे रह गए हैं। बैठने के लिए बनी बेंच टूट चुकी हैं।
शौचालय का अभाव: भारी भीड़ वाले बुधवारी बाजार क्षेत्र में एक भी सार्वजनिक शौचालय न होने के कारण, लोग उद्यान परिसर का ही उपयोग शौचालय के रूप में कर रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में भारी दुर्गंध फैली रहती है।
व्यापारिक अतिक्रमण और गंदगी: कॉम्प्लेक्स के व्यापारी भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए दुकान का कचरा उद्यान के किनारे फेंक रहे हैं।
सुरक्षा का अभाव: कोई गेट या सुरक्षाकर्मी न होने से यह मवेशियों का चारागाह बन चुका है।
काला हीरा की मांग: प्रबंधन को करने होंगे ये सुधार
SECL के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है। यदि प्रबंधन चाहे तो चंद दिनों में इसकी सूरत बदल सकती है:
1 मवेशी रोधी द्वार (Cattle-proof gates) की तत्काल स्थापना की जाए।
2 एक स्थायी देखरेख कर्मी (Caretaker) की नियुक्ति हो।
3 पानी की पर्याप्त व्यवस्था कर ग्रीन ग्रास और फूलदार पौधे लगाए जाएं।
4व्यावसायिक परिसर में आधुनिक सुविधाघर (Toilets) का निर्माण हो।


निष्कर्ष: क्या SECL प्रबंधन केवल कोयला उत्खनन को ही अपनी उपलब्धि मानता है, या स्थानीय नागरिकों के स्वास्थ्य और मनोरंजन के लिए बने इस उद्यान की हरियाली वापस लाने के लिए भी कोई ठोस कदम उठाएगा?




