बस स्टैंड पर फिर पैसों की बर्बादी, अतिक्रमण पर प्रशासन मौन और SECL की NOC के बिना ‘हवा-हवाई’ घोषणाएं। क्या कागजों तक ही सीमित रह जाएगा दीपका का विकास?
(काला हीरा न्यूज़ डेस्क)
दीपका।दीपका नगर पालिका परिषद का वर्ष 2026-27 का बजट आखिरकार तीन महीने की लंबी और थकाऊ देरी के बाद सामान्य सभा की पटल पर आ ही गया। बजट में 69 करोड़ 15 लाख रुपये की बंपर आय और 56 करोड़ 58 लाख रुपये के भारी-भरकम खर्च का सुनहरी खाका खींचा गया है। लेकिन, इस ‘करोड़ों के बजट’ की चमक उस वक्त फीकी पड़ गई, जब इसकी प्राथमिकताओं और जमीनी हकीकत का विश्लेषण किया गया।अध्यक्ष राजेंद्र राजपूत और पूर्व सीएमओ राजेश गुप्ता के बीच चली आ रही ‘प्रशासनिक खींचतान’ के कारण दीपका का विकास पहले ही तीन महीने पिछड़ चुका है। अब नए सीएमओ की एंट्री के बाद बजट तो आ गया, लेकिन जिस जनहित और सुव्यवस्थित दीपका शहर की उम्मीद नगरवासियों ने की थी, वह इन पन्नों से पूरी तरह नदारद है।
69 करोड़ के बजट पर मौन साधे रहे जनप्रतिनिधि: क्या दीपका ‘पेरिस’ बन गया है?
सामान्य सभा की बैठक का सबसे निराशाजनक पहलू रहा—जनप्रतिनिधियों की ‘चुप्पी’। 69 करोड़ के बजट पर चर्चा हो रही थी, लेकिन अधिकांश पार्षद ऐसे शांत बैठे थे मानो दीपका शहर में सड़क, नाली, पेयजल और सफाई जैसी कोई समस्या बची ही न हो। करोड़ों के खर्च पर जनसरोकार के मुद्दों पर कोई ठोस बहस न होना यह बताता है कि शहर का विकास जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता सूची में कहां खड़ा है।
अतिक्रमण पर घुटने टेकता प्रशासन: पार्षद अविनाश सिंह के सवालों ने खोली पोलइस सन्नाटे को चीरते हुए वार्ड पार्षद अविनाश सिंह ने अपनी ही सरकार (परिषद) को कटघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने वह यक्ष प्रश्न उठाया जो दीपका की सबसे बड़ी बीमारी है—’अतिक्रमण’।अविनाश सिंह ने सीधे पूछा कि नगर पालिका ने जिन अतिक्रमणकारियों को 7 दिन में जवाब देने का नोटिस थमाया था, महीनों बीत जाने के बाद उन नोटिसों का क्या हुआ? प्रशासन के पास इस सीधे सवाल का कोई जवाब नहीं था। सामान्य सभा में प्रशासन की यह ‘बोलती बंद’ होना इस बात का प्रमाण है कि अतिक्रमणकारियों के सामने नगर पालिका पूरी तरह असहाय और नतमस्तक है। जब पालिका अपने ही नोटिस का पालन नहीं करवा सकती, तो शहर से अतिक्रमण हटने की उम्मीद बेमानी है।
पुरानी गलतियों पर नई लीपापोती: बस स्टैंड और चौपाटी का सचबजट में संसाधनों की बर्बादी का सबसे बड़ा उदाहरण वार्ड क्रमांक-10 का बस स्टैंड है। पूर्व में लाखों फूंकने के बाद भी यह बस स्टैंड आज तक यात्रियों के लिए सुचारू रूप से शुरू नहीं हो सका है। यहां अतिक्रमण, अंधेरा और असामाजिक तत्वों का डेरा है। इसके बावजूद, बजट में फिर से इसके ‘सौंदर्यीकरण’ के नाम पर 40-45 लाख रुपये स्वाहा करने की तैयारी है। कांग्रेस पार्षदों का यह विरोध बिल्कुल जायज है कि पहले व्यवस्था सुधारें, अतिक्रमण हटाएं, फिर सौंदर्यीकरण का चश्मा पहनें।वहीं, वार्ड-13 में 35 लाख रुपये से चौपाटी बनाने का ‘हवा-हवाई’ प्रस्ताव पास कर दिया गया है। विपक्षी पार्षदों ने साफ कहा है कि जिस जमीन पर चौपाटी बननी है, वह एसईसीएल (SECL) की है और इसके लिए कोई NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र) नहीं ली गई है। बिना ज़मीन पक्की किए 35 लाख का प्रस्ताव सिर्फ कागजी वाहवाही लूटने का तरीका है। पालिका पहले ही करोड़ों खर्च कर दुकानें बना चुकी है, जो आज तक आवंटित नहीं हो सकी हैं, ऐसे में नए निर्माण पर सवाल उठना लाजिमी है।
मटन मार्केट: हर साल का वही पुराना वादावार्ड क्रमांक-10 के मटन मार्केट को व्यवस्थित करने का झुनझुना एक बार फिर बजट में शामिल है। नगर पालिका के गठन के बाद से आज तक शहर को एक स्थायी मटन मार्केट नहीं मिल पाया है। पूरा कारोबार मुख्य सड़कों के किनारे चल रहा है। शहरवासियों को अब इन वादों पर भरोसा नहीं रहा, क्योंकि यह घोषणा हर साल होती है और फाइलें धूल फांकती रह जाती हैं।SECL की ज़मीन और विकास के महल: बिना NOC कैसे खर्च होंगे करोड़ों?इस पूरे बजट का सबसे बड़ा ‘लूपहोल’ (खामी) यह है कि दीपका नगर पालिका के 21 में से लगभग 12-13 वार्ड सीधे तौर पर एसईसीएल (SECL) के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। 15वें वित्त आयोग और अधोसंरचना मद से इन वार्डों में करोड़ों के निर्माण कार्य प्रस्तावित कर दिए गए हैं।SECL का नियम स्पष्ट है—बिना अनुमति उनकी ज़मीन पर एक ईंट नहीं रखी जा सकती। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या नगर पालिका ने इन करोड़ों के प्रोजेक्ट्स के लिए SECL से NOC ली है? अगर नहीं, तो यह पूरा बजट सिर्फ एक धोखा है, जो कभी धरातल पर नहीं उतरेगा।
‘काला हीरा’ का संपादकीय निष्कर्ष:नगर पालिका अध्यक्ष राजेंद्र राजपूत के कार्यकाल को एक साल से ऊपर का समय बीत चुका है, लेकिन जनता आज भी ‘अच्छे दिनों’ और मूलभूत सुविधाओं के इंतजार में है। 69 करोड़ रुपये का यह भारी-भरकम बजट फिलहाल एक ऐसा चेक लग रहा है, जिस पर साइन तो हैं, लेकिन बैंक में बैलेंस (NOC और इच्छाशक्ति) की कमी है।आने वाले महीने यह तय करेंगे कि दीपका की जनता को ‘कागजी विकास’ के पन्ने मिलते हैं, या वास्तव में धरातल पर कुछ ईंटें रखी जाती हैं। फिलहाल, यह बजट विकास का दस्तावेज कम और सवालो का पुलिंदा ज्यादा नजर आ रहा है।




